क्या आप जानते हैं? भगवान शिव के आंसुओं से उत्पन्न हुआ है रुद्राक्ष | जानिए इसकी उत्पत्ति, महत्व और धारण विधि

सावन मास में भगवान शिव की पूजा का विशेष महत्व है। इस पावन माह में शिव को प्रसन्न करने के लिए जलाभिषेक, व्रत, मंत्र जाप और ध्यान किया जाता है। ऐसे में एक विशेष वस्तु जो शिव भक्ति का प्रतीक मानी जाती है—वह है रुद्राक्ष

मान्यता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के आंसुओं से हुई थी। यही कारण है कि इसे धारण करना अत्यंत पुण्यदायी, रक्षक और धार्मिक रूप से शक्तिशाली माना गया है।

📜 रुद्राक्ष की उत्पत्ति की पौराणिक कथा

शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव एक बार गहन तपस्या में लीन थे। वर्षों बाद जब उन्होंने अपनी आंखें खोलीं, तो उनकी आंखों से कुछ आंसू टपक पड़े। जहां-जहां ये आंसू धरती पर गिरे, वहां रुद्राक्ष के वृक्ष उग आए। “रुद्र” यानी शिव और “अक्ष” यानी आंख—इसलिए इसे रुद्राक्ष कहा गया।

🔱 रुद्राक्ष का धार्मिक महत्व

  • सावन मास में रुद्राक्ष का विशेष स्थान है।
  • यह मन की शुद्धि, तनाव मुक्ति और अध्यात्मिक जागरण में सहायक होता है।
  • शिव पूजा, रुद्राभिषेक और मंत्र जाप के समय रुद्राक्ष धारण करना विशेष फलदायी माना गया है।

🌿 रुद्राक्ष के प्रकार और प्रभाव

रुद्राक्ष पर जो धारियां होती हैं (मुख), उनके आधार पर रुद्राक्ष को वर्गीकृत किया गया है:

  • 1 से 14 मुखी रुद्राक्ष सामान्य रूप से प्रचलित हैं।
  • 5 मुखी रुद्राक्ष सबसे ज्यादा पहना जाता है – यह मानसिक शांति, ध्यान और तनावमुक्ति में मदद करता है।

⚠️ रुद्राक्ष धारण करने से पहले ध्यान रखें ये बातें

  • रुद्राक्ष पहनने वाला मांसाहार, नशा, और अधार्मिक कार्यों से दूरी बनाए।
  • माता-पिता की सेवा और सबका सम्मान करें।
  • गलत आचरण करने से रुद्राक्ष का सकारात्मक प्रभाव समाप्त हो सकता है।

🟠 रुद्राक्ष के आकार के अनुसार श्रेणियां

  1. आंवले के आकार वाला – उत्तम श्रेणी
  2. बेर के आकार वाला – मध्यम फलदायी
  3. चना समान आकार – सामान्य श्रेणी

ऐसा रुद्राक्ष पहनें

  • टूटा-फूटा या कीड़ों द्वारा क्षतिग्रस्त रुद्राक्ष
  • जिसकी सतह असमान या गड्ढेदार हो
  • बिना धारियों के या अधूरी संरचना वाला

👉 टिप: जिस रुद्राक्ष में स्वाभाविक रूप से धागा पिरोने के लिए छेद हो, वह सबसे शुभ माना गया है।

🙏 रुद्राक्ष धारण करने की विधि

  1. सावन के सोमवार को शिवलिंग का अभिषेक करें।
  2. पूजा में रुद्राक्ष की भी पूजा करें।
  3. फिर इसे गंगाजल या शुद्ध जल से धोकर पंचामृत से स्नान कराएं।
  4. नमः शिवाय” का जप करते हुए इसे लाल/काले/सफेद धागे में पिरोएं।
  5. इसे गले या दाहिने हाथ में धारण करें।

📿 मान्यता है कि रुद्राक्ष धारण करने वाला व्यक्ति यज्ञ, दान, तीर्थ और तप के समान पुण्यफल अर्जित करता है।

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