जन्माष्टमी व्रत के नियम: इस दिन क्या करें और क्या न करें

जन्माष्टमी का पर्व न केवल अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है, बल्कि यह भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का भी पावन अवसर है। भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को यह महोत्सव मनाया जाता है। इस वर्ष जन्माष्टमी 16 अगस्त को पड़ रही है।
इस दिन भक्तजन भगवान कृष्ण की आराधना करते हुए व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में व्रत का पारण करते हैं। शास्त्रों में इस व्रत से जुड़े कुछ विशेष नियम बताए गए हैं, जिनका पालन आवश्यक है, अन्यथा व्रत अधूरा रह सकता है। नियमों का पालन करने से ही पूर्ण पुण्य प्राप्त होता है। आइए जानते हैं, जन्माष्टमी व्रत के प्रमुख नियम।

जन्माष्टमी व्रत के नियम

  1. ब्रह्म मुहूर्त में उठकर व्रत संकल्प लें – प्रातःकाल स्नान कर मन में व्रत का संकल्प करें।
  2. ब्रह्मचर्य का पालन करें – दिन में सोने से बचें और संयम बनाए रखें।
  3. अन्न और नमक का त्याग – इस दिन अनाज, नमक और तामसिक भोजन का सेवन न करें।
  4. फलाहार का सेवन करें – दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू के आटे से बने व्यंजन व फल ग्रहण कर सकते हैं।
  5. व्रत पारण का समय – रात 12 बजे भगवान कृष्ण के जन्म के बाद ही व्रत का पारण करें।
  6. दो समय पूजन अनिवार्य – सुबह और शाम दोनों समय भगवान कृष्ण की पूजा करें।
  7. काले वस्त्र पहनें – पूजा में काले रंग के कपड़े या सामग्री का उपयोग न करें।
  8. प्रसाद से व्रत पारण – सबसे पहले भगवान कृष्ण को भोग अर्पित करें, फिर प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोलें।

जन्माष्टमी व्रत का महत्व

शास्त्रों के अनुसार, भाद्रपद माह की कृष्ण अष्टमी को भगवान विष्णु ने अपने आठवें अवतार के रूप में श्रीकृष्ण का प्राकट्य किया था। जब मथुरा के राजा कंस का अत्याचार चरम पर था, तब धर्म की स्थापना और अधर्म के अंत के लिए यह दिव्य अवतार हुआ।
जन्माष्टमी का पर्व आस्था, भक्ति और प्रेम का अद्भुत संगम है, जिसमें भक्तगण पूरे हर्षोल्लास से भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाते हैं।

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