भगवान शिव क्यों पहनते हैं नरमुंडों की माला? जानिए 108 सिरों वाले रहस्य की पौराणिक कथा

भगवान शिव की दिव्य लीलाओं और अद्वितीय रूप की अनेक विशेषताएं हैं – सिर पर चंद्रमा, शरीर पर भस्म, गले में सांप और… नरमुंडों की माला। रुद्राष्टकम् में शिवजी की महिमा का वर्णन करते हुए एक श्लोक कहता है – मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं, प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।” अर्थात् – शेर की खाल और नरमुंड की माला धारण करने वाले प्रिय शंकर को मैं प्रणाम करता हूं।

लेकिन यह सवाल वर्षों से लोगों के मन में उठता रहा है कि भोलेनाथ नरमुंड की माला क्यों पहनते हैं? इसके पीछे क्या कोई रहस्य है? क्या वे किसी विशेष व्यक्ति के सिर धारण करते हैं? एक प्राचीन पौराणिक कथा इस रहस्य से पर्दा उठाती है।

🧘‍♂️ नारद जी की जिज्ञासा और माता सती का प्रश्न

एक बार देवर्षि नारद के मन में यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि जहां सभी देवता आभूषणों से सजे रहते हैं, वहीं भगवान शिव इतनी सरल और रहस्यमयी वेशभूषा में क्यों रहते हैं – शरीर पर भभूत, गले में सांप और नरमुंडों की माला? उन्होंने यह प्रश्न सीधे ना पूछकर माता सती से एक प्रश्न किया – “क्या शिवजी आपको सबसे अधिक प्रेम करते हैं?”
माता सती ने उत्तर दिया, “हां, वे मुझसे ही सबसे अधिक प्रेम करते हैं।”
नारदजी ने अगला सवाल दागा, “तो फिर वे अपने गले में मुंडमाला क्यों पहनते हैं?”
यह सुनकर माता सती के मन में संदेह उत्पन्न हुआ और उन्होंने स्वयं भगवान शिव से इसका उत्तर मांगा।

🙏 शिवजी ने खोला नरमुंडों की माला का रहस्य

पहले तो शिवजी मुस्कुरा कर बात टालने लगे, लेकिन जब सती जी ने बार-बार आग्रह किया, तो उन्होंने सच्चाई बताई —
“इस मुंडमाला में तुम्हारे ही पिछले 107 जन्मों के सिर हैं, जिन्हें तुम त्याग चुकी हो। यह तुम्हारा 108वां जन्म है।”

यह सुनकर माता सती चौंक गईं। उन्होंने पूछा, “मैं बार-बार जन्म लेती हूं, लेकिन आप क्यों नहीं?”
तब शिवजी ने उत्तर दिया, “क्योंकि मुझे अमरता का रहस्य, अमरकथा का ज्ञान है।”
माता सती ने जिद की कि वह भी यह अमरकथा सुनना चाहती हैं।

🔥 अमरकथा और नरमुंडों की माला का पूर्ण रहस्य

शिवजी ने अमरकथा सुनानी शुरू की, लेकिन माता सती बीच में ही सो गईं और पूरी कथा नहीं सुन पाईं।
बाद में जब राजा दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान हुआ, तो माता सती ने क्रोधित होकर यज्ञ में आत्मदाह कर लिया।
उस समय उनके इस जन्म के सिर को भी शिवजी ने माला में पिरो दिया और इस प्रकार उनकी 108 नरमुंडों की माला पूरी हुई।

बाद में माता सती ने पार्वती रूप में जन्म लिया और शिवजी से पुनः विवाह किया। विवाह के समय भी शिवजी ने यही माला पहनी हुई थी।

🌑 एक अन्य कथा: राहु के 108 सिरों की माला

एक दूसरी मान्यता में कहा गया है कि शिवजी ने राहु के 108 सिरों की माला धारण की थी।
इस कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान स्वरभानु राक्षस ने देवताओं की पंक्ति में बैठकर अमृत पीने की कोशिश की।
सूर्य और चंद्रमा की शिकायत पर भगवान विष्णु ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया।
सिर बन गया राहु और धड़ बन गया केतु।

राहु ने चंद्रमा को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन वह शिवजी की शरण में पहुंच गया।
शिवजी ने चंद्रमा को अपनी जटाओं में छुपा लिया और राहु को शांत करने के लिए कहा – “तुम भोजन नहीं कर सकते, पर चूंकि तुम मेरे पास आए हो, मैं तुम्हें अपने गले में धारण करता हूं।”

कहा जाता है कि चंद्रमा के पास से अमृत की बूंदें टपकने लगीं, जिसके प्रभाव से राहु के 108 सिर उत्पन्न हो गए।
शिवजी ने उन सिरों की माला बनाकर धारण कर ली, जिसे हम मुंडमाला के नाम से जानते हैं।

🕉 निष्कर्ष: मुंडमाला – शिवजी की तटस्थता और तात्त्विक प्रतीक

भगवान शिव की मुंडमाला न केवल पौराणिक रहस्य से जुड़ी है, बल्कि यह जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के शाश्वत चक्र की गहरी प्रतीक भी है।
यह माला बताती है कि शिवजी समय, अहंकार और मृत्यु से परे हैं।
वह हर जीवन को देखते हैं, स्वीकार करते हैं और अंत में मुक्त करते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *