आज के दौर में हर व्यक्ति सफलता की दौड़ में लगा हुआ है। अधिक मेहनत को अक्सर महानता की पहचान माना जाता है। लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता एक अलग दृष्टिकोण देती है—गीता कहती है कि किसी चीज को जबरदस्ती पकड़ने की जरूरत नहीं है। जब हम चीजों पर नियंत्रण बनाने की कोशिश करते हैं, वे हमारे हाथ से फिसलने लगती हैं।
कर्म करो, लेकिन सही भाव से
गीता हमें निष्क्रिय रहने की बात नहीं करती, बल्कि यह समझने को कहती है कि हम कौन सा काम किस भावना से कर रहे हैं। कठिन परिश्रम करना गलत नहीं है, लेकिन कर्म तब ही सार्थक होता है जब वह शांत मन से किया जाए। किसी भी काम से पहले मन को स्थिर करना ज़रूरी है, क्योंकि अशांत मन में किया गया कार्य कई समस्याएं खड़ी कर सकता है।
असहजता का मतलब विफलता नहीं है
जीवन में भ्रम, शंका और अस्थिरता आना सामान्य है। यह गिरावट नहीं, बल्कि आंतरिक जागरूकता का संकेत है। जैसे अर्जुन युद्ध के समय भ्रमित होते हैं, वैसे ही हम भी नई परिस्थितियों में घबरा सकते हैं। यह कमजोरी नहीं, बल्कि बदलाव की शुरुआत है। इसलिए असहज होने से घबराएं नहीं।
कर्तव्यभाव से प्रेरित कर्म करें
गीता कर्म को दो श्रेणियों में बांटती है:
- अहंकार से प्रेरित कर्म
- धर्म या कर्तव्य से प्रेरित कर्म
जो कर्म डर, लालच या दूसरों से तुलना के आधार पर किया जाता है, वह थकावट और मानसिक तनाव देता है। लेकिन जो कार्य स्पष्टता, शांति और कर्तव्यभाव से किया जाता है, वह ऊर्जा और संतोष देता है।
संतुलन और सत्त्व गुण अपनाएं
गीता के अनुसार तीन गुण होते हैं:
- सत्त्व (स्पष्टता और शांति)
- रज (उत्साह और चंचलता)
- तम (जड़ता और आलस्य)
जब जीवन में उलझन हो, तो अक्सर हम बिना सोचे-समझे कुछ कर गुजरने की कोशिश करते हैं। लेकिन गीता कहती है कि सत्त्व गुण अपनाइए—जहाँ स्पष्टता, सरलता और संतुलन हो।
साक्षी भाव से जीना सीखें
गीता हमें सिखाती है कि घटनाओं को देखें, पर उनमें डूबें नहीं। जब हम अपने विचारों और भावनाओं को केवल एक दर्शक की तरह देखना शुरू कर देते हैं, तब हमारे भीतर स्पष्टता का जन्म होता है। स्पष्टता आने के बाद हम कम प्रयासों में अधिक परिणाम हासिल करते हैं।
भ्रम से मुक्ति और जीवन में स्पष्टता
अर्जुन की असली लड़ाई बाहरी नहीं, बल्कि अपने आंतरिक भ्रमों से थी। श्रीकृष्ण ने गीता के माध्यम से उन भ्रमों को मिटाया। उसी तरह, हमें भी अपनी शंकाओं और असमंजस को दूर करके आगे बढ़ना चाहिए।
गीता का प्रसिद्ध श्लोक कहता है:
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म पर है, फल की चिंता मत करो।
यह निष्क्रियता नहीं, बल्कि बुद्धिमत्ता का परिचय है। परिणामों पर पकड़ हमें सीमित कर देती है। लेकिन जब हम कर्म पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो असीम संभावनाओं के द्वार खुलते हैं।
निष्कर्ष: शांति से किया गया कर्म ही सच्चा धर्म है
जब हम बिना अहंकार और लालसा के कर्म करते हैं, तब हम ईश्वर की कृपा के पात्र बनते हैं। समय के साथ हमारा धर्म भी बदलता है—कभी काम करना, कभी विश्राम करना, कभी सुनना। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारा मन शांत हो। क्योंकि सबसे बड़ी स्पष्टता, अशांति से नहीं, शांति से जन्म लेती है।