गणेश चतुर्थी हिंदू धर्म का बहुत ही खास त्योहार है। भाद्रपद महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश जी का जन्मदिन बड़े हर्ष और उमंग से मनाया जाता है। इस दिन लोग गणपति बप्पा की प्रतिमा घर में लाकर पूरे विश्वास और भक्ति के साथ उनकी पूजा करते हैं।
इस दिन की सबसे खास परंपरा है – गणेश जी को मोदक का प्रसाद चढ़ाना। कहा जाता है कि मोदक के बिना गणेश पूजा पूरी नहीं होती। अब सवाल उठता है कि आखिर बप्पा को मोदक ही क्यों पसंद है? इसका जवाब हमें गणेश पुराण और कई प्राचीन कथाओं में मिलता है।
गणेश पुराण में मिलता है मोदक का महत्व
गणेश पुराण में वर्णन आता है कि एक बार देवताओं ने अमृत से निर्मित एक दिव्य मोदक माता पार्वती को भेंट स्वरूप दिया। उस दिव्य मोदक को देखकर भगवान गणेश और उनके भाई कार्तिकेय दोनों ही उसे पाना चाहते थे। तब माता पार्वती ने बताया कि –
“इस मोदक की गंध मात्र से ही अमरता प्राप्त हो सकती है। इसे ग्रहण करने वाले को सभी शास्त्रों का ज्ञान, सभी कलाओं की समझ और अपार विद्या की प्राप्ति होती है।”
यह सुनकर दोनों भाइयों में मोदक पाने की तीव्र इच्छा जाग उठी।
माता पार्वती ने ली परीक्षा
माता पार्वती ने कहा कि, “जो भी धर्माचरण और तपस्या में श्रेष्ठ साबित होगा और सबसे पहले सभी तीर्थों का भ्रमण करके लौटेगा, वही इस दिव्य मोदक का अधिकारी होगा।”
यह सुनकर कार्तिकेय जी तुरंत अपने वाहन मयूर पर सवार होकर तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। लेकिन गणेशजी का वाहन मूषक (चूहा) था, जिससे वे सभी तीर्थों का भ्रमण नहीं कर सकते थे।
तब गणेशजी ने अपनी बुद्धि का परिचय दिया। उन्होंने माता-पिता (भगवान शिव और माता पार्वती) के चारों ओर परिक्रमा कर ली और कहा –
“माता-पिता ही समस्त तीर्थों से महान हैं। उनकी परिक्रमा करना ही समस्त तीर्थों की यात्रा करने के बराबर है।”
गणेशजी को मिला दिव्य मोदक
गणेशजी की बुद्धिमानी देखकर माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने गणेशजी को वह दिव्य मोदक दे दिया और आशीर्वाद दिया कि –
- सभी शुभ कार्यों और पूजन में सर्वप्रथम गणेशजी की ही पूजा होगी।
- मोदक भगवान गणेश का प्रिय भोग बन गया।
- तभी से गणेश पूजा में मोदक अर्पित करने की परंपरा शुरू हुई।
मोदक और भगवान गणेश का विशेष संबंध
पौराणिक कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि एक बार परशुरामजी के वार से गणेशजी का एक दांत टूट गया था। दांत टूटने के कारण उन्हें कठोर भोजन खाने में परेशानी होने लगी। तब उनके लिए मुलायम मोदक तैयार किए गए जिन्हें खाकर गणेशजी प्रसन्न हो गए।
इसी वजह से उन्हें एकदंत नाम से भी जाना जाता है और उनकी प्रियतम मिठाई मोदक बन गई।
क्यों माना जाता है शुभ फलदायी?
- मोदक का आकार: मोदक का आकार शंख और कमल जैसा माना जाता है जो समृद्धि और ज्ञान का प्रतीक है।
- आध्यात्मिक महत्व: मोदक के भीतर गुड़ और नारियल भरा होता है जो “मधुरता और पवित्रता” का प्रतीक है।
- धार्मिक विश्वास: गणेशजी को मोदक अर्पित करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है और सभी विघ्न दूर हो जाते हैं।
निष्कर्ष
गणेश जी को मोदक चढ़ाने की परंपरा सिर्फ रस्म नहीं है, बल्कि इसका संबंध प्राचीन कथाओं और आस्था से है। गणेश पुराण और अन्य पौराणिक प्रसंग बताते हैं कि मोदक गणेश जी का सबसे प्रिय भोग है।
इसलिए चाहे गणेश चतुर्थी हो या कोई विशेष अवसर, भक्त बप्पा को मोदक जरूर अर्पित करते हैं और मानते हैं कि इससे जीवन में सुख-समृद्धि मिलती है।