जैन धर्म में पर्युषण पर्व का विशेष महत्व माना गया है। यह पर्व केवल उपवास और व्रत का ही प्रतीक नहीं है, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम, तप और क्षमा का भी संदेश देता है। जैन समाज इसे वर्ष के सबसे बड़े आध्यात्मिक पर्वों में गिनता है। पर्युषण पर्व का आयोजन हर साल भाद्रपद मास में किया जाता है।
इस पर्व की सबसे खास बात यह है कि इसे श्वेतांबर और दिगंबर, दोनों संप्रदाय अपने-अपने तरीके से और अलग-अलग दिनों की अवधि में मनाते हैं।
✨ पर्युषण पर्व की अवधि और परंपरा
पर्युषण पर्व कुल 18 दिनों का होता है। इसमें –
- श्वेतांबर समुदाय 8 दिनों तक व्रत और उपवास करता है।
- दिगंबर समुदाय 10 दिनों तक इसे “दशलक्षण पर्व” के रूप में मनाता है।
श्वेतांबर परंपरा का पर्व जैसे ही समाप्त होता है, उसके अगले दिन से दिगंबर संप्रदाय का पर्व शुरू हो जाता है।
📅 कब से शुरू होगा पर्युषण पर्व 2025?
- श्वेतांबर संप्रदाय : पंचांग के अनुसार श्वेतांबर समाज के लोग पर्युषण पर्व को 21 अगस्त से 28 अगस्त 2025 तक मनाएंगे।
- दिगंबर संप्रदाय : दिगंबर समाज में यह पर्व 28 अगस्त से 6 सितंबर 2025 तक चलेगा।
इस तरह पूरे 18 दिनों तक जैन समाज आध्यात्मिक साधना, उपवास और आत्मचिंतन में लीन रहता है।
🙏 क्यों मनाया जाता है पर्युषण पर्व?
जैन धर्म के महान संत भगवान महावीर स्वामी ने इस पर्व की परंपरा स्थापित की थी। आचार्य डॉ. लोकेश मुनि के अनुसार, जैसे हिंदू धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व है, उसी प्रकार जैन धर्म में वर्षा ऋतु के दौरान साधु-साध्वी एक ही स्थान पर रहते हुए तप, स्वाध्याय और ध्यान में लीन रहते हैं।
पर्युषण पर्व का मूल उद्देश्य है –
- आत्मा की शुद्धि करना
- तप और संयम के मार्ग पर चलना
- क्षमा और अहिंसा का पालन करना
- बीते वर्ष में अनजाने में किए गए दोषों और गलतियों के लिए क्षमा मांगना
यही कारण है कि पर्युषण पर्व का समापन क्षमापना दिवस (मिच्छामी दुक्कड़म्) से होता है, जब सभी लोग एक-दूसरे से क्षमा मांगते हैं।
🕉️ कैसे मनाया जाता है पर्युषण पर्व?
जैन धर्म के अनुसार, तप के 12 प्रकार बताए गए हैं –
अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्या, रसपरित्याग, कायाक्लेश, संल्लिणता, आभ्यंतर तप, प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान और व्युत्सर्ग।
इन्हीं के माध्यम से आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि की साधना की जाती है।
पर्युषण पर्व में लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपवास रखते हैं –
- कोई 3 दिन का उपवास करता है
- कोई 8 दिन का
- कुछ लोग पूरे 30 दिन तक भी व्रत का पालन करते हैं
इस उपवास में केवल जल ग्रहण किया जाता है, भोजन पूरी तरह त्याग दिया जाता है।
📖 पर्युषण पर्व में क्या करते हैं जैन साधक?
- भगवान महावीर की वाणी (आगम ग्रंथों) का स्वाध्याय
- मंत्र जप और ध्यान
- मौन साधना
- प्रवचन और धार्मिक सभाओं में भाग लेना
महावीर स्वामी ने जीवनभर तपस्या और ध्यान पर जोर दिया था, इसलिए यह पर्व भी उन्हीं की शिक्षाओं को आत्मसात करने का अवसर है।
🚫 पर्युषण पर्व के दौरान क्या न करें?
व्रती को इस पर्व में कुछ विशेष नियमों का पालन करना चाहिए –
- क्रोध, ईर्ष्या और कटु वाणी से बचें
- छल-कपट, लालच और प्रपंच से दूर रहें
- तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांसाहार आदि) का सेवन न करें
- व्यर्थ के मनोरंजन और सांसारिक विषयों में समय न गवाएँ
🌸 निष्कर्ष
पर्युषण पर्व केवल जैन धर्म का ही नहीं, बल्कि पूरे मानव समाज को क्षमा, संयम और आत्मचिंतन का संदेश देने वाला पर्व है। श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदाय इसे अलग-अलग तरीकों से मनाते हैं, लेकिन उद्देश्य एक ही है – आत्मशुद्धि और मोक्ष की ओर अग्रसर होना।
यह पर्व हर किसी को सिखाता है कि जीवन में सबसे बड़ा धर्म है – क्षमा, करुणा और अहिंसा।