बृहस्पतिवार प्रदोष व्रत की कथा
एक समय देवराज इंद्र और असुर वृत्र की सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। देवताओं की सेना ने असुरों को बुरी तरह पराजित कर दिया, लेकिन अपनी सेना के विनाश से क्रोधित होकर वृत्र स्वयं युद्ध में कूद पड़ा। उसने अपनी मायावी शक्ति से विकराल रूप धारण कर लिया, जिसे देखकर देवगण भयभीत हो गए और देवगुरु बृहस्पति की शरण में पहुंचे।
देवगुरु बृहस्पति ने बताया कि यह वृत्र असुर वास्तव में पूर्व जन्म में एक तपस्वी राजा था, जिसका नाम चित्ररथ था। उसने गंधमादन पर्वत पर घोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था। एक बार वह अपने विमान से कैलाश पर्वत पहुंचा, जहां भगवान शिव माता पार्वती के साथ विराजमान थे।
चित्ररथ ने वहां अनुचित टिप्पणी करते हुए शिव-पार्वती के साथ उपहास किया। इस पर माता पार्वती ने क्रोधित होकर उसे शाप दे दिया कि वह विमान से गिरकर राक्षस योनि में जन्म लेगा। यही चित्ररथ आगे चलकर वृत्रासुर बना और त्वष्टा ऋषि के तप से जन्मा।
बृहस्पति ने इंद्र से कहा कि वृत्र शिवभक्त है, इसलिए उसे साधारण उपायों से नहीं मारा जा सकता। इसके लिए बृहस्पतिवार को प्रदोष व्रत करके भगवान शिव को प्रसन्न करना होगा। इंद्र ने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए व्रत किया और भगवान शिव की कृपा से वृत्र पर विजय प्राप्त की। इसके बाद देवलोक में पुनः शांति स्थापित हो गई।
🌟 बृहस्पतिवार प्रदोष व्रत का महत्व:
- भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
- शत्रु बाधा, भय और संकट से मुक्ति मिलती है।
- मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और जीवन में शांति आती है।